Thursday, 23 July 2026

औपनिषदिक ज्ञान बनाम यूरोपीय रेनेसां:

औपनिषदिक ज्ञान बनाम यूरोपीय रेनेसां:

प्राचीन भारतीय ज्ञान को मानव जाति की सर्वोच्च उपलब्धि मानने में वर्तमान बौद्धिकों को भले ग्लानि हो रही हो किंतु पश्चिमी दार्शनिकों को इस सच्चाई को स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं था।
जिन दार्शनिकों ने भारतीय संस्कृति की भूरि-भूरि प्रशंसा की उनमें जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक वोन श्लेगल और आर्थर शोपेनहावर प्रमुख हैं। इसी परंपरा में महान रूसी उपन्यासकार टाल्सटाय भी आते हैं ।

1808 में श्लेगल ने भारतीय ज्ञान की प्रशंसा में एक किताब लिखी थी, जिसका नाम ' आन द लैंग्वेज एंड विज्डम आफ इंडियन्स ( On the Language and Wisdom of the Indians) है।
 विदित हो कि उन्होंने उपनिषदों में निहित ज्ञान की तुलना यूरोप के रेनेसां से की थी। फलत: विदेशों में यूरोपीय विचारकों के बीच हिंदू धर्म और संस्कृत साहित्य के प्रति भारी जिज्ञासा पैदा हो गई। इनके अध्ययन के लिए यूरोप के विश्वविद्यालयों में इंडोलोजी विभाग तक खुल गए। अपने भाई की सहायता से स्वयं श्लेगल ने संस्कृत भाषा का प्रेस खोला।
उनका मानना था कि विश्व की सभी भाषाओं की जननी संस्कृत है तथा दुनिया की सभी सभ्यताओं ने राजनीतिक गठन के तौर तरीके भारत से सीखे।

 शोपेनहावर ने तो यहां तक कह दिया कि उपनिषदों के अध्ययन से अधिक कल्याणकारी और उत्थान प्रवण दुनिया में कोई दूसरा ग्रंथ नहीं है। वेद , उपनिषद और श्रीमद्भागवत के बारे उनकी उक्ति बहुत प्रेरणास्पद है।
 उनका मानना था कि ये ग्रंथ मानव बुद्धि की उच्चतम अभिव्यक्ति हैं । अपने इस विचार को उन्होंने 'वर्ल्ड ऐज विल एंड रिप्रेजेंटेशन ' में कलम बद्ध किया है। 
बताते चलें कि भारतीय ज्ञान परंपरा को यूरोप तक पहुंचाने में मुसलमानों का हाथ रहा है। इस्लामिक विद्वानों ने ही पहले उपनिषदों का अनुवाद फारसी में किया था। दारशिकोह के शासन काल में यह कार्य संपन्न हुआ था।
  फिर उपनिषद फारसी से लैटिन भाषा में अनुदित हुए। शोपेनहावर ने जिस भाषा में उपनिषदों को पढ़ा , वह लैटिन भाषा ही थी। दरअसल उपनिषदों का लैटिन में अनुवाद फ्रांस के एक विद्वान ने किया था।
 शोपेनहावर उक्त ग्रंथों से इतने अविभूत थे कि उन्होंने यह विश्वास व्यक्त किया था कि भारतीय ज्ञान एक न एक दिन पश्चिम में प्रवाहित होगा और यूरोपीय विचारों और संस्कृति में मौलिक बदलाव लाएगा । विडंबना है कि उसी ज्ञान और दार्शनिक परंपरा को हम कीड़ा -मकोड़ा समझते हैं। 

एक ओर विदेशी धरती की ओर से भारतीय ज्ञान की इतनी अभिपुष्टि और इतना सम्मान और दूसरी ओर भारतीय माटी से इस ज्ञान का इस रूप में खंडन व अपमान, यह समझ से परे है! 
पर ज्ञान है क्या? 
ज्ञान कोई दिखाई पड़ने वाली चीज नहीं है। यह फुदकने वाली कोई चिड़िया नहीं है। बल्कि यह चीजों के बारे में आंतरिक समझ को व्यक्त करने वाला एक प्रत्यय ( आइडिया ) और प्रत्ययों का समूह है जो शाब्दिक अभिव्यक्ति पाकर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक तथा एक समाज के दूसरे समाज तक संचरित होता है।

दृष्टांत के तौर पर वेदांत और उपनिषदों की यह स्थापना कि' सभी चीजों में ईश्वर या परमात्मा का अंश है ' , एक ज्ञान है जिसका सहज संदेश यह है कि संसार के चर- चराचर सभी प्राणियों व पदार्थो के प्रति हमें आदर का भाव रखना चाहिए व उनसे प्रेम करना चाहिए।
दूसरी ओर बाइबल के पूराने विधान ( ओल्ड टेस्टामेंट) का यह प्रावधान भी एक ज्ञान है कि दुनिया के सभी चर चराचर पदार्थ मनुष्य और खासकर पुरुषों के उपभोग के लिए ईश्वर द्वारा बनाए गए हैं। बाइबल के जेनेसिस नामक किताब ( अध्याय) में यह विचार देखा जा सकता है।   
बाइबल के इसी अध्याय में यह भी लिखा है कि औरतें पुरषों के मनोरंजन के लिए बनाई गई हैं। 
एक तरफ ' तेन त्यक्तेन भुंजीथा:" ईशावास्य उपनिषद का श्लोक है जहां त्याग के साथ भोग करने की शिक्षा है वही बाइबल हमें मह सिखाता है कि दुनिया खाकर- पीकर हजम करने के लिए है। स्त्रियों पर पुरूष वर्चस्व ही नहीं, सामी धर्म के राजनीतिक वर्चस्व की जड़ भी बाइबिल के पुराने विधान में है।

सवाल है कि कौन सा ज्ञान मनुष्योचित है? भारत का वह ज्ञान जहां स्त्री अर्धनारीश्वर के रूप में समता की अधिकारी है या वह जहां स्त्री पुरूषों के लिए केवल मौज- मस्ती की वस्तु है। 
आप कहेंगे कि भारत में भी तो स्त्रियों की दुर्दशा है। यहां तो स्त्रियां यूरोप से भी तुच्छ अवस्था में हैं। हां, हो सकती हैं पर मैं बात वर्तमान यथार्थ की नहीं कर रहा हूं, बल्कि बात उस कसौटी की कर रहा हूं, जिसे हमने जाने- अनजाने पीछे धकेल दिया है। 
कसौटी निखारने से निखरती है। यह निरंतर व्याख्या से संवरती और दैनिक जीवन में उतरती है। 
क्या वर्ग संघर्ष के विचारों का संश्रव भारतीय मार्क्सवादियों के मानस में एक दिन में हुआ है या दशकों के प्रचार-प्रसार से यह संभव हुआ ? 
वस्तुत: जब शोपेनहावर यूरोपीय संस्कृति में मौलिक बदलाव की बात करते हैं तो उनका संदर्भ यही है।
 यह सन्दर्भ महान विचारक और उपन्यासकार लियो टाल्सटाय तक आते-आते कितना खुल कर सामने आ जाता है, यह उनके लेखन और उनके अपने जीवन में स्पष्ट झलकता है।

 टॉलस्टॉय कुलीन घराने से आते थे। हजारों दास थे और अपार संपत्ति थी। परंतु उनपर उपनिषद, श्रीमद्भागवत और वेदांत का प्रभाव इस कदर हुआ कि उन्होंने स्वेच्छा से न केवल दरिद्रता का जीवन अपनाया बल्कि इसके प्रवक्ता बन गए।

स्वेच्छा से दरिद्रता अपनाने की बात हमें अटपटी लग सकती है, पर यह ज्ञान भारतीय जीवन दर्शन का अभिन्न अंग है और कई- कई आदर्शों में यह एक प्रमुख आदर्श है। और आदर्श अटपटे ही होते हैं।
वस्तुत: मनुष्यता और इंसानियत की रट लगाने से हम मनुष्य नहीं बन जाएंगे। उसके लिए आदर्श प्रस्तुत करने पड़ते हैं।
 जब महर्षि याग्यबल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी को सांसारिक संपत्ति सौंपने लगे तो मैत्रेयी ने कहा कि जो धन और ऐश्वर्य आदमी को मनुष्य न रहने दे, वह लेकर हमें क्या करना है।
"तवैव वाहास्तव नृत्यगीते , 
येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम।"

 दरअसल दरिद्रता अभिशाप तब है जब किसी पर आरोपित की जाए, किंतु जब इसे अपनी इच्छा से अंगीकार किया जाय तो यह एक मानवीय आदर्श बन जाता है। स्वार्थ और कर्तव्य के बीच द्वंद्व में कर्तव्य की जीत ही आदर्श है।

 दरिद्रता एक बरदान भी है क्योंकि यह धन- दौलत, यश और पैसे के प्रलोभन से हमें रोकती है। हमारे सामने इसके अनन्य उदाहरण हैं किंतु हम टाल्सटाय का ही अभी उल्लेख करते हैं।

टॉलस्टॉय पहले माशांहारी थे, वे शाकाहारी बन गए। दासों को मुक्त कर दिया और एक परीब्राजक का जीवन अपना लिया। वे एक ईसाई थे तथा ईसा मसीह द्वारा दिए गये " सरमन आफ दि माउंट" को ईसाई धर्म की रीढ़ मानते थे किंतु नए तरीके का जो जीवन टाल्सटाय ने अपनाया , उसकी प्रेरणा उन्होंने बाइबल से नहीं ली बल्कि भारतीय जीवन दर्शन और उपनिषदों से ली।

 गौरतलब है कि अहिंसा में श्रद्धा रखने और चर्च के बर्चस्ववादी रूप की भर्त्सना के कारण उन्हें 1901 में चर्च से निष्कासित कर दिया गया। दरअसल स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं और भाषणों को सुनने और उनकी पुस्तकों के अध्ययन से रूढ़िवादी ईसाई धर्म से टाल्सटाय का मोहभंग हो गया था । 
गरज यह कि हमने बाइबल और पश्चिम के उपभोगवादी दर्शन को हृदयंगम कर लिया है, हम अचानक वेदांत और उपनिषदों द्वारा विहित त्याग और मूल्यों पर आधारित जीवन अख्तियार करने से रहे किन्तु उन ग्रंथों को अपमानित करने तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को कोसने की अपनी धृष्टता पर थोड़ा अंकुश तो लगा ही सकते हैं!


No comments:

Post a Comment