Thursday, 30 July 2026

टीकमगढ_जिले_का_संपूर्ण_इतिहास

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बुन्देलखण्ड का टीकमगढ़ जिला ऐतिहासिक एवं पुरातात्वीय दृष्टि से भारतीय इतिहास में विशिष्ट स्थान रखता है। बुन्देलखण्ड की ओरछा रियासत मध्यकाल में सर्वाधिक चर्चित रियासत रही है। बुन्देला राजवंश के शासकों द्वारा ई. 1531 से 1783 तक ओरछा को राजधानी रूप में उपयोग करने के बाद ईस्वी 1783 में टेहरी को अपनी राजधानी बनाया गया। बुन्देला राजा विक्रमजीत सिंह द्वारा भगवान कृष्ण के एक नाम टीकम के आधार पर टीकमगढ़ नाम रखा।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जावे तो यह भू-भाग पौराणिक काल में चेदी साम्राज्य का भाग था, जो चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व तक अस्तित्व में बना रहा। मगध साम्राज्य के उत्कर्ष के साथ ही यह भू-भाग मगध का अंग बना, किन्तु स्थानीय प्रशासन का मुख्यालय सागर जिले के एरण नामक स्थल पर बना रहा। एरण के स्थानीय शासकों ने समुद्रगुप्त के आक्रमण तक इस भू-भाग पर अपना अस्तित्व बनाये रखा।गुप्त काल के पश्चात् गुर्जर-प्रतीहार एवं चंदेल शासकों का शासन रहा।चंदेल शासन के बाद बुन्देला राजवंश ने लम्बे समय तक शासन किया। इस काल में बड़े पैमाने पर मंदिरों, महलों, छत्रियों, तालाबों एवं बावड़ियों का निर्माण हुआ, जो हमारी महत्वपूर्ण धरोहर हैं।

इसे क्रमवार ऐसे समझ सकते हैं 
1. पौराणिक काल:,पौराणिक कथानको के आधार पर ऐसा माना जाता है कि बाणासुर की पुत्री ऊषा कुंडेश्वर स्थित ऊषा कुंड पर शिव आराधना करने आती थीं। महाभारत काल में यह धसान के किनारे बसा क्षेत्र दशार्ण देश कहलाता था। यह भू-भाग पौराणिक काल में चेदि साम्राज्य का हिस्सा था।  

2. प्राचीन काल:
लिखित इतिहास से पहले के प्रमाण इस जिले में अनेक स्थान पर बिखरे खंडहरों में मिलते हैं। 
• नाग काल (10 ईसा पूर्व - 220 ईस्वी) का शिवलिंग देवरदा में मिला है जिसे बैजनाथ शिवजी कहा जाता है।  
 • वाकाटक (सन 300-520 ई.) शासकों का मूल स्थान अविभाजित टीकमगढ़ का बाघाट गांव माना जाता है।
 • गुप्त काल के प्रतीक मोहनगढ़ किले में विष्णु मय लक्ष्मी, शेषशायी विष्णु और भेलसी गाँव (बल्देवगढ़ के पास) में वराह की विशाल मूर्ति है। 
3. पूर्व-मध्यकाल:
• 5वीं शताब्दी में यहाँ गहरवार सत्ता और फिर उन्हें हटाकर प्रतिहारों का शासन रहा। प्रतिहार गुप्तों के मांडलिक रहे थे , मडखेरा और उमरी के सूर्य मंदिर प्रतिहार काल के प्रमाण हैं। 
6-पूरे टीकमगढ़ जिले में हर गांव में बने गौड़ बब्बा , गुरइया दाई के चबूतरे यह प्रमाणित करते हैं कि इस क्षेत्र में गौड़ सत्ता भी रही है । वैसे यहां बहुत प्राचीन समय से गौड़ भील इत्यादि रहने के प्रमाण मिलते हैं लेकिन गौड शासकों के बारे में क्रमबद्ध इतिहास प्राप्त नहीं होता है परंतु यह माना जाता है कि टीकमगढ़ जिला खटौला के गौड़ राजा से शासित रहा है । कहा जाता है कि सर्वप्रथम माँदेले ( लोधी ) और दाँगी शासकों ने गौडो को हराकर सत्ता हासिल की थी । टीकमगढ़ ज़िले में कई जगह गौडो के बनाए कौडुआ ( पत्थरों की बांगड) मिलती है जो यहां गौड़ सत्ता की निशानियां है । उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश सीमा पर स्थित रानीगंज महेबा चक्र की पहाड़ी पर जंगल जिसे पठारी जंगल कहते है , बनी विशाल बांगड और अन्य पुरा चिन्ह गौड़ शासकों की निशानियां हैं । 
• 6वीं शताब्दी में बेतवा और धसान के बीच मांदेले (लोधियों) की सत्ता भी प्रभावशाली रही। यह गौडों को प्रतिस्थापित कर सत्तासीन हुए माने जाते हैं । 
4. चंदेल काल - स्वर्ण युग (830 - 13वीं सदी):
प्रतिहारों के बाद टीकमगढ़ चंदेलों द्वारा शासित रहा और इसी काल में सबसे ज्यादा विकास हुआ। इस क्षेत्र को तब जैजाकभुक्ति कहा जाता था। लगभग हर गांव में बने चंदेलकालीन तालाब और मठ इसकी महत्ता प्रमाणित करते हैं।
• कीर्तिवर्मन चंदेल (1053-1100) के मंत्री महिपाल ने नारायणपुर में विष्णु मंदिर बनवाया। 
• सलक्षण वर्मन (1100-1110) ने उर नदी के तट पर सलक्षणपुर (आज का सरकनपुर) बसाया, वहां तालाब, मठ और मंदिर बनवाए।
 • मदनवर्मन (1129-1167) ने जतारा और अहार में मदनसागर तालाब, बल्देवगढ ( बांध) का ग्वालसागर तालाब , अहार में मदनेश्वर का विशाल शिवमठ बनवाया और इस जगह का नाम मदनेशपुरी रखा। उनके काल में बल्देवगढ़, अहार, पपावनी, जिनागढ ,झिनगुआं मे मदन बेर वनवाई गई और अहार के जैन मंदिर भी बने।
 • परमार्दिदेव चंदेल (1167-1237) के समय अहार में सन 1180 में प्रसिद्ध मूर्तिकार पापट ने 21 फीट ऊँची शांतिनाथ भगवान की जैन प्रतिमा बनाई।
परमार्दिदेव की सन 1182 में पृथ्वीराज चौहान से हुई पराजय के बाद भी टीकमगढ़ पर चंदेल शासन बने रहने के प्रमाण मिलते हैं । 
त्रिलौकवर्मन ( 1203-45) के समय ककददाहा ( संभवतः ककरवाहा ) में त्रिलोक वर्मन और मुसलमानों के बीच युद्ध होने और उनके सामंत राउत को मारे जाने के शिलालेख मिले हैं । 
वीर वर्मन ( 1246-1285 ) के समय पपावनी जिला टीकमगढ़ के मैदान में चंदेल सेनापति राउत आभी ने नरवर के राजा गोविंद और ग्वालियर के राजा हरिदेव से सन 1254 में युद्ध किया था जिसमें चंदेल सेनापति राउत आभी की विजय हुई थी । पपावनी के पास स्थित विजय स्तंभ ( जैत खंब ) एक बावड़ी और चंदेली पुरा चिन्ह इस बात की निशानी है ।

5- बुंदेला काल - गहरवार के रूप में इस क्षेत्र के शासक रहे थे लगभग 800 वर्ष बाद यही गहरवार क्षत्रिय बुंदेला के रूप में पुनः इस क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाने में कामयाब हुए थे । यह काशी से आए माने गए हैं और यह महौनी में अपनी राजधानी बनाए हुए थे । गढ़ कुडार में सोहनपाल बुंदेला द्वारा खंगार सत्ता पर कब्जा करने के बाद जतारा पर भी कब्जा करने के लेख मिलते हैं । सोहनपाल बुंदेला कुड़ार के राजा बनने के बाद सन 1501 तक बुंदेला सत्ता की राजधानी गढकुडार ही रही थी । 
1501 से बुंदेला सत्ता की राजधानी ओरछा बनी एवं इसका नाम ओरछा रियासत रखा गया । 
टीकमगढ़ ज़िला ओरछा रियासत का भाग रहा है । प्रसिद्ध बुंदेला शासक महराजा छत्रसाल की पैत्रिक जागीर महेवा एवं उनकी जन्म स्थली मोर पहाड़ी टीकमगढ़ जिले में ही स्थित है । महराजा छत्रसाल मूल रूप से ओरछा के बुंदेला राजा के वंशज ही रहे हैं । 
सन 1783 में ओरछा के महाराजा बिक्रमजीत में टीकमगढ़ को ओरछा रियासत की राजधानी बनाकर टीकमगढ़ को महत्त्वपूर्ण दर्जा प्रदान किया गया पहले यह टेहरी के नाम से जानी जाती थी और ओरछा रियासत की जागीर होती थी ।

टीकमगढ़ में विक्रमजीत सिंह के बाद हुए शासकों में धर्मपाल सिंह (1817-1834 ई.), तेजसिंह (1834-1841 ई.), सुजान सिंह (1841-1854 ई.), हमीर सिंह (1854-1874), प्रतापसिंह (1874-1930 ई.), वीरसिंह द्वितीय (1930-1947 ई.) शासक रहे।

ओरछा रियासत की टीकमगढ़ राजधानी के अंतिम राजा वीर सिंह जू देव द्वतीय रहे थे जिन्होंने 17 दिसम्बर 1947 को बुंदेलखंड के राजाओं में सर्वप्रथम राज्य शासन की बागडोर जनता के हाथ सौंपकर लोकप्रिय उत्तरदायी शासन की स्थापना कर दी थी । जिसके प्रथम प्रधानमंत्री लाला राम वाजपेयी वनाए गए । केबिनेट के अन्य सदस्यों में चतुर्भुज पाठक अर्थमंत्री , मिथिला प्रसाद गोस्वामी न्याय मंत्री , पं मनकामेश्वर नाथ जुत्सी गृहमंत्री ( शासकीय) बने । 
12 मार्च 1948 को बुंदेलखंड एवं बघेलखंड के राज्यों को मिलाकर विन्ध्य प्रदेश निर्माण हेतु भारत सरकार के गृह विभाग के सचिव वी पी मेनन नौगाँव आए थे । जिन्होंने बुंदेलखंड के सभी राजाओं से रियासतों के विलीनीकरण समझौते पर हस्ताक्षर करवाए थे । 
इस तरह टीकमगढ़ ज़िला विंध्य प्रदेश का हिस्सा बना । फिर 1 नवंबर 1956 को राज्यों के पुनर्गठन के बाद टीकमगढ़ ज़िला मध्य प्रदेश का एक ज़िला बना । 1 अक्टूबर 2018 को टीकमगढ़ ज़िले का विभाजन कर निवाडी जिला अस्तित्व में आया था ।
संकलन -पुष्पेन्द्र सिंह चौहान (कृप्या कापी पेस्ट न करें यह हमारी बौद्धिक संपदा है ) 
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