Tuesday, 28 July 2026

शरीर वाणी और मन।

शरीर मनो वाक यत कर्म प्रारभते नर:।
न्यायम वा विपरीतम वा तस्य एतै पंच हेतवम्।।
भगवतगीता। 
वाणी से व्यक्त किए गए विचारों से व्यक्ति की पहचान संभव नहीं होती।

 क्योंकि कर्म करने के तीन साधन उपलब्ध हैं। शरीर वाणी और मन।

 अब इनमें मन सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि वह स्रोत है वाणी और शरीर द्वारा किए जाने वाले कर्म का।

और किसके मन में क्या खिचड़ी पक रही है यह जानना संभव नहीं होता साधारण जन के लिए। सिर्फ योगी और महात्मा ही झांक सकते हैं किसी दूसरे के मन में।

जो बोल देता है उसे आप पहचान लेते हो, जो बोलता नहीं है और सारे कृत्य या दुष्कृत्य करता रहता है उसे आप महात्मा मान लेते हो

किसी शायर ने कहा है:
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी।
जिसको भी देखिए कई बार देखिए।

मुखौटे इतने होते हैं हमारे अंदर, कि कई बार हम स्वयं भी भ्रमित हो जाते हैं कि हमारा असली चेहरा कौन सा है?

सत्य बोलने का साहस नहीं होता सबके अंदर, क्योंकि मनुष्य भविष्य में होने वाले लाभ और हानि का गणित सदैव करता रहता है। इसलिए अनेक मुखौटे धारण करना आवश्यक हो जाता है। मन में अपार घृणा को भी मीठे शब्दों की चाशनी में लपेटकर प्रस्तुत करता है, या करवाता है, यदि उसके अनुयाई हुए तो। और अनुयाई प्रायः वही होते हैं जो लोभ और लाभ की गणित में कुशल होते हैं: मनसा वाचा कर्मणा। 
ऋषियों ने कहा है:
मनसा में वाचा प्रतिष्ठा। 
वाचा में मनसा प्रतिष्ठा। 
अर्थात जो मेरे मन में हो वही मेरी वाणी से मुखरित और ध्वनित हो। और मेरी वाणी से वही मुखरित हो जो मेरे मन में हो।
साधारण सांसारिक जीवन में यदि ऐसा हो तो गर्दनें उतर जाएं, कपार फूट जाय, आपस में, घर परिवार में, पास पड़ोस में, यार मित्रों में, शत्रुओं की तो बात ही छोड़ दीजिए। 
तो क्या ऋषि गण असत्य बोल रहे हैं, गलत सीख दे रहे हैं? 
ऐसा नहीं है। वे असत्य नहीं बोल रहे हैं। असत्य नहीं है परंतु अव्यवहारिक है संसार में, संसारी जीव के लिए। 

 अव्यवहारिक इसलिए क्योंकि आज ही नहीं, पूर्व में भी, व्यवहार का सदैव यही अर्थ रहा है कि वह बोलो जिससे मामला न बिगड़े। सत्य ऐसा हो जो प्रिय हो। जो प्रायः संभव नहीं होता। इसीलिए लोग कहते हैं सत्य कड़वा होता है। 
 व्यवहारिक होना जीवन में सफल होने की कुंजी है। 
  इसे ही आजकल प्रैक्टिकल होना बोला जाता है। 

मुझसे बहुत से लोग बोलते थे कि भाई तुम प्रैक्टिकल नहीं हो। मैं उनसे पूछता था कि इसका अर्थ समझा दीजिए कि ऐसा कहने का तात्पर्य क्या है आपका। वे समझाते नहीं थे। शायद उन्हें स्वयं इसका तात्पर्य नहीं पता था, या संभवत: वे मुझे समझाना नहीं चाहते थे। 
परंतु मेरी समझ के अनुसार व्यवहारिक होने का अर्थ है मुखौटा धारण करना। जिसकी ट्रेनिंग बचपन से ऐसी होती है, वे जीवन में अत्यंत व्यवहारिक होते हैं, सफल होते हैं। सफलता का अर्थ अपने अपने अनुसार व्याख्या कीजिए। परंतु उन्हें अंतत: इतने मुखौटे धारण करने पड़ते हैं कि उन्हें स्वयं का अपना चेहरा विस्मृत हो जाता है। 
ऋषि जो कह रहा है वह उस मार्ग की बात कर रहा है जब आप अपने स्वरूप को जानने की ओर अग्रसर होते हैं। उसने निष्पत्ति बताई है, उस प्रक्रिया की, उस साधन की, जहां ये मार्ग हमें ले जायेगा। जब आप राग द्वेष से मुक्त होंगे, तो आपके मन में ऐसी कोई बात ऐसा कोई विचार आएगा ही नहीं, जिसे व्यक्त करने से किसी को आघात पहुंचे, किसी के मन को चोट पहुंचे। 
ऋषि वीतराग अवस्था के मन की स्थिति का वर्णन कर रहा है, जो है तो सत्य के अत्यंत निकट, परंतु व्यवहारिक नहीं है। इसलिए संसार में जब तक रहना है इस मार्ग को त्याग दें, व्यवहारिक बनें, मुखौटा धारण करें, वरना असफलता निश्चित है। 

इस पर गहन विचार कीजिए। 
❤️❤️

® त्रिभुवन सिंह

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